Vijñāna Bhairava Tantra · 1.126

Vijñāna Bhairava Tantra 1.126

1.126
वर्णस्य सविसर्गस्य विसर्गान्तं चितिं कुरु । निराधारेण चित्तेन स्पृशेद्ब्रह्म सनातनम् ॥१२६॥
varṇasya savisargasya visargāntaṃ citiṃ kuru | nirādhāreṇa cittena spṛśed brahma sanātanam
anuṣṭubh
— विसर्ग के अन्त (कर्म कारक — समासगत) ; — चित्ति, चैतन्य (कर्म कारक) ; — सनातन ब्रह्म (कर्म कारक)

[पुनरुक्ति — श्लोक ७४] विसर्ग-सहित वर्ण के विसर्ग-अन्त पर चित्ति को लगाओ; निराधार चित्त से (साधक) सनातन ब्रह्म का स्पर्श कर लेता है।