वर्णस्य सविसर्गस्य विसर्गान्तं चितिं कुरु ।
निराधारेण चित्तेन स्पृशेद्ब्रह्म सनातनम् ॥१२६॥
varṇasya savisargasya visargāntaṃ citiṃ kuru |
nirādhāreṇa cittena spṛśed brahma sanātanam
anuṣṭubh
[पुनरुक्ति — श्लोक ७४] विसर्ग-सहित वर्ण के विसर्ग-अन्त पर चित्ति को लगाओ; निराधार चित्त से (साधक) सनातन ब्रह्म का स्पर्श कर लेता है।