अबिन्दुमविसर्गं च अकारं जपतो महान् ।
उदेति देवि सहसा ज्ञानौघः परमेश्वरः ॥१२५॥
abindum avisargaṃ ca akāraṃ japato mahān |
udeti devi sahasā jñānaughaḥ parameśvaraḥ
anuṣṭubh
[पुनरुक्ति — श्लोक ७३] बिन्दु-रहित, विसर्ग-रहित 'अ'-कार का जप करने वाले को सहसा ज्ञान-ओघ-स्वरूप परमेश्वर का उदय होता है, हे देवि।