Vijñāna Bhairava Tantra · 1.125

Vijñāna Bhairava Tantra 1.125

1.125
अबिन्दुमविसर्गं च अकारं जपतो महान् । उदेति देवि सहसा ज्ञानौघः परमेश्वरः ॥१२५॥
abindum avisargaṃ ca akāraṃ japato mahān | udeti devi sahasā jñānaughaḥ parameśvaraḥ
anuṣṭubh
— बिन्दु-रहित (कर्म कारक) ; — विसर्ग-रहित (कर्म कारक) ; — ज्ञान-ओघ, ज्ञान-प्रवाह (कर्ता कारक — समासगत)

[पुनरुक्ति — श्लोक ७३] बिन्दु-रहित, विसर्ग-रहित 'अ'-कार का जप करने वाले को सहसा ज्ञान-ओघ-स्वरूप परमेश्वर का उदय होता है, हे देवि।