Vijñāna Bhairava Tantra · 1.124

Vijñāna Bhairava Tantra 1.124

1.124
यस्य कस्येन्द्रियस्यापि व्याघाताच्च निरोधतः । प्रविष्टस्याद्वये शून्ये तत्रैवात्मा प्रकाशते ॥१२४॥
yasya kasyendriyasyāpi vyāghātāc ca nirodhataḥ | praviṣṭasyādvaye śūnye tatraivātmā prakāśate
anuṣṭubh
— व्याघात (अवरोध) से (अपादान कारक) ; — निरोध से (अपादान कारक) ; — अद्वय-शून्य में (अधिकरण कारक)

[पुनरुक्ति — श्लोक ७२] किसी भी इन्द्रिय के व्याघात या निरोध से अद्वय-शून्य में प्रविष्ट (साधक) के लिए वहीं आत्मा प्रकाशित होती है।