एवमेव निमील्यादौ नेत्रे कृष्णाभमग्रतः ।
प्रसार्य भैरवं रूपं भावयंस्तन्मयो भवेत् ॥१२३॥
evam eva nimīlyādau netre kṛṣṇābham agrataḥ |
prasārya bhairavaṃ rūpaṃ bhāvayaṃs tanmayo bhavet
anuṣṭubh
[पुनरुक्ति — श्लोक ७१] पहले आँखें मूँदकर, सामने काले रंग का (शून्य) फैलाकर, भैरव-रूप की भावना करता हुआ (साधक) तन्मय हो जाता है।