Vijñāna Bhairava Tantra · 1.123

Vijñāna Bhairava Tantra 1.123

1.123
एवमेव निमील्यादौ नेत्रे कृष्णाभमग्रतः । प्रसार्य भैरवं रूपं भावयंस्तन्मयो भवेत् ॥१२३॥
evam eva nimīlyādau netre kṛṣṇābham agrataḥ | prasārya bhairavaṃ rūpaṃ bhāvayaṃs tanmayo bhavet
anuṣṭubh
— मूँदकर (क्त्वान्त) ; — कृष्ण-आभा, काले रंग का (कर्म कारक — समासगत) ; — तन्मय, तद्रूप (कर्ता — समासगत)

[पुनरुक्ति — श्लोक ७१] पहले आँखें मूँदकर, सामने काले रंग का (शून्य) फैलाकर, भैरव-रूप की भावना करता हुआ (साधक) तन्मय हो जाता है।