एवमेव दुर्निशायां कृष्णपक्षागमे चिरम् ।
तैमिरं भावयन्रूपं भैरवं रूपमेष्यति ॥१२२॥
evam eva durniśāyāṃ kṛṣṇapakṣāgame ciram |
taimiraṃ bhāvayan rūpaṃ bhairavaṃ rūpam eṣyati
anuṣṭubh
[पुनरुक्ति — श्लोक ७०] इसी प्रकार दुर्निशा में, कृष्ण-पक्ष में, चिर काल तक तैमिर (अन्धकार) की भैरव-रूप भावना करता हुआ (साधक उस) रूप को प्राप्त होता है।