Vijñāna Bhairava Tantra · 1.122

Vijñāna Bhairava Tantra 1.122

1.122
एवमेव दुर्निशायां कृष्णपक्षागमे चिरम् । तैमिरं भावयन्रूपं भैरवं रूपमेष्यति ॥१२२॥
evam eva durniśāyāṃ kṛṣṇapakṣāgame ciram | taimiraṃ bhāvayan rūpaṃ bhairavaṃ rūpam eṣyati
anuṣṭubh
— दुर्निशा (घोर रात्रि) में — अधिकरण कारक ; — तैमिर (अन्धकार)-रूप (कर्म कारक) ; — भैरव-रूप के रूप में (कर्म कारक)

[पुनरुक्ति — श्लोक ७०] इसी प्रकार दुर्निशा में, कृष्ण-पक्ष में, चिर काल तक तैमिर (अन्धकार) की भैरव-रूप भावना करता हुआ (साधक उस) रूप को प्राप्त होता है।