Vijñāna Bhairava Tantra · 1.121

Vijñāna Bhairava Tantra 1.121

1.121
किञ्चिज्ज्ञातं द्वैतदायि बाह्यालोकस्तमः पुनः । विश्वादि भैरवं रूपं ज्ञात्वानन्तप्रकाशभृत् ॥१२१॥
kiñcijjñātaṃ dvaitadāyi bāhyālokas tamaḥ punaḥ | viśvādi bhairavaṃ rūpaṃ jñātvānantaprakāśabhṛt
anuṣṭubh
— अल्प-ज्ञात (कर्ता कारक — समासगत) ; — बाह्य आलोक, बाह्य प्रकाश (कर्ता कारक — समासगत) ; — अनन्त-प्रकाश-धारी (कर्ता कारक — समासगत)

[पुनरुक्ति — श्लोक ६९] अल्प-ज्ञात द्वैत-कारक है; बाह्य आलोक और अन्धकार (भी द्वैत-कारक); विश्व-आदि को भैरव-रूप जानकर (साधक) अनन्त-प्रकाश-धारी हो जाता है।