Vijñāna Bhairava Tantra · 1.120

Vijñāna Bhairava Tantra 1.120

1.120
लीनं मूर्ध्नि वियत्सर्वं भैरवत्वेन भावयेत् । तत्सर्वं भैरवाकारतेजस्तत्त्वं समाविशेत् ॥१२०॥
līnaṃ mūrdhni viyat sarvaṃ bhairavatvena bhāvayet | tat sarvaṃ bhairavākāratejastattvaṃ samāviśet
anuṣṭubh
— लीन व्योम (कर्म कारक) ; — भैरवत्व के रूप में (करण कारक) ; — भैरव-आकार-तेज-तत्त्व, भैरव-स्वरूप तेजोमय तत्त्व (कर्म कारक — समासगत)

[पुनरुक्ति — श्लोक ६८] मूर्धा में लीन समस्त व्योम (आकाश) की भैरवत्व-रूप से भावना करे; वह सब भैरव-आकार-तेज-तत्त्व में पूर्णतः प्रविष्ट हो जाता है।