लीनं मूर्ध्नि वियत्सर्वं भैरवत्वेन भावयेत् ।
तत्सर्वं भैरवाकारतेजस्तत्त्वं समाविशेत् ॥१२०॥
līnaṃ mūrdhni viyat sarvaṃ bhairavatvena bhāvayet |
tat sarvaṃ bhairavākāratejastattvaṃ samāviśet
anuṣṭubh
[पुनरुक्ति — श्लोक ६८] मूर्धा में लीन समस्त व्योम (आकाश) की भैरवत्व-रूप से भावना करे; वह सब भैरव-आकार-तेज-तत्त्व में पूर्णतः प्रविष्ट हो जाता है।