The Essence of the Tantra· 6.60 / 82

The Essence of the Tantra6.60

6.60

समानो हार्दीषु दशासु नाडीषु सञ्चरन् समस्ते देहे साम्येन रसादीन् वाहयति । तत्र दिगष्टके सञ्चरन् तद्दिक्पतिचेष्टाम् इव प्रमातुः अनुकारयति

Transliteration (IAST)

samāno hārdīṣu daśāsu nāḍīṣu sañcaran samaste dehe sāmyena rasādīn vāhayati | tatra digaṣṭake sañcaran taddikpaticeṣṭām iva pramātuḥ anukārayati

— समान (समता-वायु) ; — हृदय से उत्पन्न दस नाड़ियों में ; — संचरण करता हुआ ; — साम्य से, समान रूप से ; — रस आदि (शारीरिक रसों) का ; — वहन करता है, बहाता है ; — दिग्-अष्टक में (आठ दिशाओं में) ; — उस दिशा के स्वामी की चेष्टा ; — प्रमाता से ; — अनुकरण कराता है

समान हृदय से उत्पन्न दस नाड़ियों में संचरण करता हुआ समस्त देह में साम्य से रस आदि का वहन करता है। वह दिग्-अष्टक (आठ दिशाओं) में संचरण करता हुआ प्रमाता से उस-उस दिक्पति की चेष्टा का मानो अनुकरण कराता है।