The Essence of the Tantra· 4.3 / 46

The Essence of the Tantra4.3

4.3

स च एवंरूपः समस्तेभ्यः परिच्छिन्नस्वभावेभ्यः शिवान्तेभ्यः तत्त्वेभ्यो यत् उत्तीर्णम् अपरिच्छिन्नसंविन्मात्ररूपं तद् एव च परमार्थः तत् वस्तुव्यवस्थास्थानं तत् विश्वस्य ओजः तेन प्राणिति विश्वम् तद् एव च अहम् अतो विश्वोत्तीर्णो विश्वात्मा च अहम् इति

Transliteration (IAST)

sa ca evaṃrūpaḥ samastebhyaḥ paricchinnasvabhāvebhyaḥ śivāntebhyaḥ tattvebhyo yat uttīrṇam aparicchinnasaṃvinmātrarūpaṃ tad eva ca paramārthaḥ tat vastuvyavasthāsthānaṃ tat viśvasya ojaḥ tena prāṇiti viśvam tad eva ca aham ato viśvottīrṇo viśvātmā ca aham iti

— परिच्छिन्न-स्वभाव वाले (तत्त्वों) से ; — शिव-पर्यन्त तत्त्वों से ; — उत्तीर्ण — परे, ऊपर उठा हुआ ; — अपरिच्छिन्न संविन्मात्र-रूप ; — परमार्थ — परम सत्य ; — वस्तु-व्यवस्था का स्थान — सब वस्तुओं की व्यवस्था का आधार ; — ओज — प्राण-तेज, वीर्य ; — प्राण धारण करता है, जीता है ; — विश्वोत्तीर्ण — विश्व से परे ; — विश्वात्मा — विश्व का आत्मा, सर्व-व्यापी

और वह इस प्रकार का (परम तत्त्व) समस्त परिच्छिन्न-स्वभाव वाले शिव-पर्यन्त तत्त्वों से जो उत्तीर्ण (परे) है, वह अपरिच्छिन्न संविन्मात्र-रूप है — और वही परमार्थ है; वही वस्तु-व्यवस्था का स्थान है; वही विश्व का ओज (तेज) है, उसी से विश्व प्राण धारण करता है। और वही 'अहम्' है — अतः मैं विश्व से उत्तीर्ण भी हूँ और विश्वात्मा भी।