The Essence of the Tantra· 20.34 / 65

The Essence of the Tantra20.34

20.34

तत्र गुरुः तद्वर्ग्यः ससन्तानः तत्त्ववित् कन्या अन्त्या वेश्या अरुणा तत्त्ववेदिनी वा इति चक्रयागे मुख्यपूज्याः विशेषात् सामस्त्येन

Transliteration (IAST)

tatra guruḥ tadvargyaḥ sasantānaḥ tattvavit kanyā antyā veśyā aruṇā tattvavedinī vā iti cakrayāge mukhyapūjyāḥ viśeṣāt sāmastyena

— वहाँ (उस याग में) ; — गुरु ; — उसके वर्ग/परम्परा का ; — सन्तान-सहित (दीक्षा-परम्परा वाला) ; — तत्त्ववित् (तत्त्व-ज्ञाता) ; — कन्या ; — अन्त्या (निम्न-जाति की स्त्री) ; — वेश्या ; — अथवा तत्त्व जानने वाली अरुणा (दीक्षिता) ; — चक्र-याग में ; — मुख्य पूज्य ; — विशेषतः समस्त रूप से

वहाँ गुरु, उसके वर्ग का सन्तान-सहित तत्त्ववित्, कन्या, अन्त्या (निम्न-जाति स्त्री), वेश्या, अथवा तत्त्व जानने वाली अरुणा — ये चक्र-याग में मुख्य पूज्य हैं, विशेषतः समस्त रूप से।