The Essence of the Tantra· 20.35 / 65

The Essence of the Tantra20.35

20.35

तत्र मध्ये गुरुः तदावरणक्रमेण गुर्वादिसमय्यन्तं वीरः शक्तिः इति क्रमेण इत्य् एवं चक्रस्थित्या वा पङ्क्तिस्थित्या वा आसीत ततो गन्धधूपपुष्पादिभिः क्रमेण पूजयेत् ततः पात्रं सदाशिवरूपं ध्यात्वा शक्त्यमृतध्यातेन आसवेन पूरयित्वा तत्र भोक्त्रीं शक्तिं शिवतया पूजयित्वा तयैव देवताचक्रतर्पणं कृत्वा नरशक्तिशिवात्मकत्रितयमेलकं ध्यात्वा आवरणावतरणक्रमेण मोक्षभोगप्राधान्यं बहिर् अन्तश् च तर्पणं कुर्यात् पुनः प्रतिसञ्चरणक्रमेण एवं पूर्णं भ्रमणं चक्रं पुष्णाति

Transliteration (IAST)

tatra madhye guruḥ tadāvaraṇakrameṇa gurvādisamayyantaṃ vīraḥ śaktiḥ iti krameṇa ity evaṃ cakrasthityā vā paṅktisthityā vā āsīta tato gandhadhūpapuṣpādibhiḥ krameṇa pūjayet tataḥ pātraṃ sadāśivarūpaṃ dhyātvā śaktyamṛtadhyātena āsavena pūrayitvā tatra bhoktrīṃ śaktiṃ śivatayā pūjayitvā tayaiva devatācakratarpaṇaṃ kṛtvā naraśaktiśivātmakatritayamelakaṃ dhyātvā āvaraṇāvataraṇakrameṇa mokṣabhogaprādhānyaṃ bahir antaś ca tarpaṇaṃ kuryāt punaḥ pratisañcaraṇakrameṇa evaṃ pūrṇaṃ bhramaṇaṃ cakraṃ puṣṇāti

— वहाँ मध्य में गुरु ; — उसके आवरण-क्रम से (परिकर-क्रम से) ; — गुरु आदि से समयी-पर्यन्त ; — वीर, शक्ति — इस क्रम से ; — चक्र-स्थिति से अथवा पंक्ति-स्थिति से ; — बैठे ; — गन्ध, धूप, पुष्प आदि से ; — पूजे ; — पात्र को सदाशिव-रूप (ध्यान कर) ; — शक्ति-अमृत रूप से ध्यात आसव से ; — पूरित कर ; — भोक्त्री शक्ति को शिवता से (पूजित कर) ; — देवता-चक्र का तर्पण ; — नर-शक्ति-शिव-आत्मक त्रितय के मेलक (मिलन) ; — आवरण-अवतरण-क्रम से ; — मोक्ष-भोग की प्रधानता ; — बाहर एवं भीतर तर्पण ; — प्रतिसञ्चरण-क्रम से (प्रत्यावर्तन-क्रम से) ; — पूर्ण भ्रमण चक्र को पुष्ट करता है

वहाँ मध्य में गुरु, उसके आवरण-क्रम से गुरु आदि से समयी-पर्यन्त, वीर, शक्ति — इस क्रम से, चक्र-स्थिति से अथवा पंक्ति-स्थिति से बैठे। फिर गन्ध, धूप, पुष्प आदि से क्रमशः पूजे। फिर पात्र को सदाशिव-रूप ध्यान कर, शक्ति-अमृत रूप से ध्यात आसव से पूरित कर, वहाँ भोक्त्री शक्ति को शिवता से पूजित कर, उसी से देवता-चक्र का तर्पण कर, नर-शक्ति-शिव-आत्मक त्रितय के मेलक को ध्यान कर, आवरण-अवतरण-क्रम से मोक्ष-भोग की प्रधानता से बाहर-भीतर तर्पण करे। फिर प्रतिसञ्चरण-क्रम से इस प्रकार पूर्ण भ्रमण चक्र को पुष्ट करता है।