Stanzas on the Divine Pulsation · 1.21

Stanzas on the Divine Pulsation 1.21

1.21
अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्वविविक्तये । जाग्रदेव निजं भावमचिरेणाधिगच्छति ॥२१॥
ataḥ satatam udyuktaḥ spanda-tattva-viviktaye | jāgrad eva nijaṃ bhāvam acireṇādhigacchati ||
anuṣṭubh
— इसलिए, अतः (अव्यय) ; — सतत उद्यत — सदा प्रयत्नशील (कर्ता कारक एकवचन — पदबन्ध) ; — स्पन्द-तत्त्व के विवेक के लिए (सम्प्रदान कारक — समासगत) ; — जाग्रत् अवस्था में ही (अव्यय) ; — निज भाव — अपने स्वस्वरूप को (कर्म कारक) ; — अचिर में, शीघ्र ही (अव्यय) ; — प्राप्त करता है, पहुँचता है (वर्तमान काल)

अतः जो स्पन्द-तत्त्व के विवेक के लिए सदा उद्यत रहता है, वह जाग्रत् अवस्था में ही शीघ्र अपने निज भाव (स्वस्वरूप) को प्राप्त कर लेता है।