Stanzas on the Divine Pulsation · 1.20

Stanzas on the Divine Pulsation 1.20

1.20
अप्रबुद्धधियस्त्वेते स्वस्थितिस्थगनोद्यताः । पातयन्ति दुरुत्तारे घोरे संसारवर्त्मनि ॥२०॥
aprabuddha-dhiyas tv ete sva-sthiti-sthaganodyatāḥ | pātayanti duruttāre ghore saṃsāra-vartmani ||
anuṣṭubh
— अप्रबुद्ध बुद्धि वाले — अजागृत मन वाले (कर्म कारक बहुवचन — समासगत) ; — किन्तु, परन्तु (विरोधार्थक अव्यय) ; — ये (गुण-स्पन्द, या मन्त्र) — पु.कर्ता बहु. ; — अपनी (वास्तविक) स्थिति को आच्छादित करने में उद्यत (कर्ता कारक बहुवचन — समासगत) ; — गिरा देती हैं, पतन कराती हैं (प्रेरणार्थक क्रिया, वर्तमान) ; — दुस्तर — पार करने में कठिन (विशेषण, अधिकरण कारक) ; — घोर (भयानक संसार) में — नपुं.अधि. एक. ; — संसार के मार्ग में (अधिकरण कारक — समासगत)

किन्तु अप्रबुद्ध (अजागृत) बुद्धि वालों के लिए ये ही (शक्तियाँ) अपनी निज स्थिति को आच्छादित करने में उद्यत होकर उन्हें घोर तथा दुस्तर संसार-मार्ग में गिरा देती हैं।