पश्यन्त्याथो शिवावस्था क्रियाफलसमाप्तितः ।
क्रियाया वाथ प्रारम्भे कल्पनीया प्रशान्तता ॥८७॥
paśyantyātho śivāvasthā kriyāphalasamāptitaḥ |
kriyāyā vātha prārambhe kalpanīyā praśāntatā
(आक्षेप:) अब, 'देखने' (पश्यन्ती-दर्शन) से शिव-अवस्था (शुद्ध शान्ति) — या तो क्रिया के फल की समाप्ति पर, अथवा क्रिया के प्रारम्भ में — (वहाँ) प्रशान्तता कल्पनीय है।