सत्यानि स्वात्मरूपाणि पश्यतो न समानता ॥८६॥
satyāni svātmarūpāṇi paśyato na samānatā
जो (शिव जगत् के पदार्थों को) सत्य और अपने ही आत्म-रूप के रूप में देखता है, उसकी (पश्यन्ती के साथ) समानता नहीं (क्योंकि पश्यन्ती जगत् को असत्य देखती है)।
जो (शिव जगत् के पदार्थों को) सत्य और अपने ही आत्म-रूप के रूप में देखता है, उसकी (पश्यन्ती के साथ) समानता नहीं (क्योंकि पश्यन्ती जगत् को असत्य देखती है)।