वादित्वप्रतिवादित्वे कस्माच्चेत्तस्य तत्स्थिते ॥७६॥
vāditvaprativāditve kasmāccettasya tatsthite
यदि (पूछो कि) 'फिर वादित्व और प्रतिवादित्व (वाद-विवाद में पक्ष-प्रतिपक्ष) किसलिए?' — (उत्तर:) क्योंकि वह उस (पक्ष-प्रतिपक्ष) रूप में ही स्थित है।
यदि (पूछो कि) 'फिर वादित्व और प्रतिवादित्व (वाद-विवाद में पक्ष-प्रतिपक्ष) किसलिए?' — (उत्तर:) क्योंकि वह उस (पक्ष-प्रतिपक्ष) रूप में ही स्थित है।