Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 7.1 / 30

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)7.1

7.1
मय्यासक्तमनाः पार्थ ! योगं युञ्जन्मदाश्रितः । असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ ७-१ ॥
mayyāsaktamanāḥ pārtha ! yogaṃ yuñjanmadāśritaḥ | asaṃśayaṃ samagraṃ māṃ yathā jñāsyasi tacchṛṇu || 7-1 ||
— मुझमें आसक्त मन वाला, हे पार्थ ; — योग का अभ्यास करते हुए, मेरा आश्रय लेकर ; — मुझे सम्पूर्ण, निःसंशय ; — जिस प्रकार जानेगा, वह सुन

हे पार्थ, मुझमें आसक्त मन वाला होकर, मेरा आश्रय लेकर योग का अभ्यास करते हुए, तू मुझे जिस प्रकार सम्पूर्ण और निःसंशय जान सकेगा, वह सुन।