Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.28 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.28

6.28
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् । उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥ ६-२८ ॥
praśāntamanasaṃ hyenaṃ yoginaṃ sukhamuttamam | upaiti śāntarajasaṃ brahmabhūtamakalmaṣam || 6-28 ||
— इस प्रशान्त मन वाले योगी को ; — उत्तम सुख ; — प्राप्त होता है, जिसका रजस् शान्त ; — जो ब्रह्मभूत, निष्पाप

इस प्रशान्त मन वाले, जिसका रजोगुण शान्त हो गया, जो ब्रह्मभूत और निष्पाप है — ऐसे योगी को उत्तम सुख प्राप्त होता है।