Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 5.9 / 29

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)5.9

5.9
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ५-९ ॥
pralapanvisṛjangṛhṇannunmiṣannimiṣannapi | indriyāṇīndriyārtheṣu vartanta iti dhārayan || 5-9 ||
— बोलते, त्यागते, ग्रहण करते ; — आँखें खोलते, मूँदते हुए भी ; — इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों में ; — बरत रही हैं ऐसा धारणा रखते हुए

— और बोलते, त्यागते, ग्रहण करते, आँखें खोलते और मूँदते हुए भी, यह धारणा रखते हुए कि इन्द्रियाँ ही इन्द्रियों के विषयों में बरत रही हैं।