प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥
५-९ ॥
pralapanvisṛjangṛhṇannunmiṣannimiṣannapi |
indriyāṇīndriyārtheṣu vartanta iti dhārayan ||
5-9 ||
— और बोलते, त्यागते, ग्रहण करते, आँखें खोलते और मूँदते हुए भी, यह धारणा रखते हुए कि इन्द्रियाँ ही इन्द्रियों के विषयों में बरत रही हैं।