Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 5.28 / 29

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)5.28

5.28
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः । विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥ ५-२८ ॥
yatendriyamanobuddhirmunirmokṣaparāyaṇaḥ | vigatecchābhayakrodho yaḥ sadā mukta eva saḥ || 5-28 ||
— इन्द्रिय, मन, बुद्धि को संयत किए ; — मोक्ष में तत्पर मुनि ; — इच्छा, भय, क्रोध से रहित ; — जो सदा है वह मुक्त ही है

इन्द्रिय, मन और बुद्धि को संयत किए हुए, मोक्ष में तत्पर, इच्छा, भय और क्रोध से रहित जो मुनि है — वह सदा मुक्त ही है।