यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥
५-२८ ॥
yatendriyamanobuddhirmunirmokṣaparāyaṇaḥ |
vigatecchābhayakrodho yaḥ sadā mukta eva saḥ ||
5-28 ||
इन्द्रिय, मन और बुद्धि को संयत किए हुए, मोक्ष में तत्पर, इच्छा, भय और क्रोध से रहित जो मुनि है — वह सदा मुक्त ही है।