Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 5.11 / 29

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)5.11

5.11
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि । योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये ॥ ५-११ ॥
kāyena manasā buddhyā kevalairindriyairapi | yoginaḥ karma kurvanti saṅgaṃ tyaktvā''tmaśuddhaye || 5-11 ||
— शरीर, मन, बुद्धि से ; — और केवल इन्द्रियों से भी ; — योगी कर्म करते हैं ; — आसक्ति त्यागकर आत्मशुद्धि के लिए

योगी शरीर, मन, बुद्धि और केवल इन्द्रियों के द्वारा भी आसक्ति को त्यागकर आत्मा की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं।