Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 4.12 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)4.12

4.12
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः । क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥ ४-१२ ॥
kāṅkṣantaḥ karmaṇāṃ siddhiṃ yajanta iha devatāḥ | kṣipraṃ hi mānuṣe loke siddhirbhavati karmajā || 4-12 ||
— कर्मों के फल की कामना करते हुए ; — यहाँ देवताओं की पूजा करते हैं ; — क्योंकि मनुष्य-लोक में शीघ्र ; — कर्म से उत्पन्न सिद्धि मिलती है

कर्मों के फल की कामना करने वाले इस लोक में देवताओं की पूजा करते हैं; क्योंकि मनुष्य-लोक में कर्म से उत्पन्न सिद्धि शीघ्र मिल जाती है।