Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 3.28 / 48

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)3.28

3.28
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः । गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥ ३-२८ ॥
tattvavittu mahābāho guṇakarmavibhāgayoḥ | guṇā guṇeṣu vartanta iti matvā na sajjate || 3-28 ||
— किन्तु तत्त्वज्ञ, हे महाबाहु ; — गुण और कर्म के विभाग में ; — गुण गुणों में बरतते हैं ; — ऐसा मानकर आसक्त नहीं होता

किन्तु हे महाबाहु, गुण और कर्म के विभाग के तत्त्व को जानने वाला 'गुण ही गुणों में बरतते हैं' ऐसा मानकर आसक्त नहीं होता।