Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.65 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.65

18.65
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ १८-६५ ॥
manmanā bhava madbhakto madyājī māṃ namaskuru | māmevaiṣyasi satyaṃ te pratijāne priyo'si me || 18-65 ||
— मुझमें मन वाला हो, मेरा भक्त ; — मेरा पूजक, मुझे नमस्कार कर ; — तू मुझे ही प्राप्त होगा — तुझसे सत्य ; — प्रतिज्ञा करता हूँ, तू मुझे प्रिय

मुझमें मन वाला हो, मेरा भक्त हो, मेरा पूजक हो, मुझे नमस्कार कर; तू मुझे ही प्राप्त होगा — यह मैं सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तू मुझे प्रिय है।