Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.64 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.64

18.64
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः । इष्टोऽसि मे दृढमतिस्ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥ १८-६४ ॥
sarvaguhyatamaṃ bhūyaḥ śṛṇu me paramaṃ vacaḥ | iṣṭo'si me dṛḍhamatistato vakṣyāmi te hitam || 18-64 ||
— सबसे गुह्यतम, फिर ; — मेरे परम वचन को सुन ; — तू मुझे प्रिय, दृढ़निश्चयी ; — इसी से मैं तेरे हित की बात कहूँगा

सबसे गुह्यतम मेरे परम वचन को फिर सुन; तू मुझे अत्यन्त प्रिय और दृढ़निश्चयी है, इसी से मैं तेरे हित की बात कहूँगा।