Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.2 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.2

18.2
काम्यानां कर्मणां त्यागं संन्यासं कवयो विदुः । सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ १८-२ ॥
kāmyānāṃ karmaṇāṃ tyāgaṃ saṃnyāsaṃ kavayo viduḥ | sarvakarmaphalatyāgaṃ prāhustyāgaṃ vicakṣaṇāḥ || 18-2 ||
— काम्य कर्मों का त्याग ; — कवि (विद्वान्) संन्यास जानते हैं ; — समस्त कर्मों के फल का त्याग ; — विचक्षण लोग त्याग कहते हैं

कवि (विद्वान्) काम्य कर्मों के त्याग को संन्यास जानते हैं; और विचक्षण लोग समस्त कर्मों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं।