काम्यानां कर्मणां त्यागं संन्यासं कवयो विदुः ।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥
१८-२ ॥
kāmyānāṃ karmaṇāṃ tyāgaṃ saṃnyāsaṃ kavayo viduḥ |
sarvakarmaphalatyāgaṃ prāhustyāgaṃ vicakṣaṇāḥ ||
18-2 ||
कवि (विद्वान्) काम्य कर्मों के त्याग को संन्यास जानते हैं; और विचक्षण लोग समस्त कर्मों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं।