Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.1 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.1

18.1
संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ १८-१ ॥
saṃnyāsasya mahābāho tattvamicchāmi veditum | tyāgasya ca hṛṣīkeśa pṛthakkeśiniṣūdana || 18-1 ||
— संन्यास का, हे महाबाहु ; — तत्त्व मैं जानना चाहता हूँ ; — और त्याग का, हे हृषीकेश ; — पृथक्, हे केशिनिषूदन

हे महाबाहु, हे हृषीकेश, हे केशिनिषूदन, मैं संन्यास का और त्याग का तत्त्व पृथक्-पृथक् जानना चाहता हूँ।