Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 17.18 / 28

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)17.18

17.18
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् । क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥ १७-१८ ॥
satkāramānapūjārthaṃ tapo dambhena caiva yat | kriyate tadiha proktaṃ rājasaṃ calamadhruvam || 17-18 ||
— सत्कार, मान, पूजा के लिए ; — और दम्भ से जो तप ; — किया जाता है, वह यहाँ कहा गया ; — राजस, चञ्चल, अध्रुव

जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिए तथा दम्भ से किया जाता है — वह यहाँ राजस कहा गया है, जो चञ्चल और अध्रुव है।