Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 16.4 / 24

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)16.4

16.4
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च । अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥ १६-४ ॥
dambho darpo'bhimānaśca krodhaḥ pāruṣyameva ca | ajñānaṃ cābhijātasya pārtha sampadamāsurīm || 16-4 ||
— दम्भ, दर्प और अभिमान ; — क्रोध और कठोरता ; — और अज्ञान, उत्पन्न पुरुष के, हे पार्थ ; — आसुरी सम्पदा को (लेकर)

दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान — हे पार्थ, ये आसुरी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष में होते हैं।