Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 16.3 / 24

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)16.3

16.3
तेजः क्षमा धृतिस्तुष्टिरद्रोहो नातिमानिता । भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥ १६-३ ॥
tejaḥ kṣamā dhṛtistuṣṭiradroho nātimānitā | bhavanti sampadaṃ daivīmabhijātasya bhārata || 16-3 ||
— तेज, क्षमा, धृति, सन्तोष ; — अद्रोह, अत्यन्त अभिमान का अभाव ; — दैवी सम्पदा में होते हैं ; — उसे लेकर उत्पन्न पुरुष में, हे भारत

तेज, क्षमा, धृति, सन्तोष, अद्रोह और अत्यन्त अभिमान का अभाव — हे भारत, ये दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष में होते हैं।