Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)16.3
तेजः क्षमा धृतिस्तुष्टिरद्रोहो नातिमानिता ।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥
१६-३ ॥
tejaḥ kṣamā dhṛtistuṣṭiradroho nātimānitā |
bhavanti sampadaṃ daivīmabhijātasya bhārata ||
16-3 ||
— तेज, क्षमा, धृति, सन्तोष ; — अद्रोह, अत्यन्त अभिमान का अभाव ; — दैवी सम्पदा में होते हैं ; — उसे लेकर उत्पन्न पुरुष में, हे भारत तेज, क्षमा, धृति, सन्तोष, अद्रोह और अत्यन्त अभिमान का अभाव — हे भारत, ये दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष में होते हैं।