Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 15.5 / 20

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)15.5

15.5
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः । द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै- र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥ १५-५ ॥
nirmānamohā jitasaṅgadoṣā adhyātmanityā vinivṛttakāmāḥ | dvandvairvimuktāḥ sukhaduḥkhasaṃjñai- rgacchantyamūḍhāḥ padamavyayaṃ tat || 15-5 ||
— मान-मोह से रहित, आसक्ति के दोष को जीतकर ; — अध्यात्म में नित्य, कामनाओं से निवृत्त ; — सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से मुक्त ; — मोहरहित जन उस अव्यय पद को प्राप्त होते हैं

मान और मोह से रहित, आसक्ति के दोष को जीतकर, अध्यात्म में नित्य स्थित, कामनाओं से निवृत्त, और सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से मुक्त — मोहरहित जन उस अव्यय पद को प्राप्त होते हैं।