Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 14.2 / 27

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)14.2

14.2
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ १४-२ ॥
idaṃ jñānamupāśritya mama sādharmyamāgatāḥ | sarge'pi nopajāyante pralaye na vyathanti ca || 14-2 ||
— इस ज्ञान का आश्रय लेकर ; — मेरे साथ सादृश्य को प्राप्त हुए ; — सृष्टि में भी उत्पन्न नहीं होते ; — और प्रलय में व्यथित नहीं होते

इस ज्ञान का आश्रय लेकर वे मेरे साथ सादृश्य (समान धर्म) को प्राप्त हुए; सृष्टि के समय भी वे उत्पन्न नहीं होते और प्रलय में भी व्यथित नहीं होते।