Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 14.17 / 27

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)14.17

14.17
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च । प्रमादमोहौ जायेते तमसोऽज्ञानमेव च ॥ १४-१७ ॥
sattvātsañjāyate jñānaṃ rajaso lobha eva ca | pramādamohau jāyete tamaso'jñānameva ca || 14-17 ||
— सत्त्व से ज्ञान उत्पन्न होता है ; — और रजस् से लोभ ; — प्रमाद और मोह उत्पन्न होते हैं ; — और तमस् से अज्ञान

सत्त्व से ज्ञान उत्पन्न होता है, और रजस् से लोभ; तमस् से प्रमाद और मोह उत्पन्न होते हैं, तथा अज्ञान भी।