Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 12.15 / 20

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)12.15

12.15
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः । हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १२-१५ ॥
yasmānnodvijate loko lokānnodvijate ca yaḥ | harṣāmarṣabhayodvegairmukto yaḥ sa ca me priyaḥ || 12-15 ||
— जिससे लोक उद्विग्न नहीं होता ; — और जो लोक से उद्विग्न नहीं होता ; — हर्ष, अमर्ष, भय, उद्वेग से ; — मुक्त जो, वह भी मुझे प्रिय

जिससे लोक उद्विग्न नहीं होता और जो लोक से उद्विग्न नहीं होता, जो हर्ष, अमर्ष (असहिष्णुता), भय और उद्वेग से मुक्त है — वह भी मुझे प्रिय है।