Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.5 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.5

11.5
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः । नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ ११-५ ॥
paśya me pārtha rūpāṇi śataśo'tha sahasraśaḥ | nānāvidhāni divyāni nānāvarṇākṛtīni ca || 11-5 ||
— मेरे रूपों को देख, हे पार्थ ; — सैकड़ों और हजारों ; — नाना प्रकार के, दिव्य ; — और नाना वर्ण-आकृति वाले

हे पार्थ, मेरे सैकड़ों और हजारों रूपों को देख, जो नाना प्रकार के, दिव्य, और नाना वर्ण तथा आकृति वाले हैं।