मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमयन्ति च ॥
१०-९ ॥
maccittā madgataprāṇā bodhayantaḥ parasparam |
kathayantaśca māṃ nityaṃ tuṣyanti ca ramayanti ca ||
10-9 ||
मुझमें चित्त वाले, मुझमें प्राण अर्पित किए हुए, परस्पर बोध कराते हुए और नित्य मेरी कथा करते हुए वे सन्तुष्ट होते हैं और आनन्द पाते हैं।