Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 10.8 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)10.8

10.8
अहं सर्वस्य प्रभवो इतः सर्वं प्रवर्तते । इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥ १०-८ ॥
ahaṃ sarvasya prabhavo itaḥ sarvaṃ pravartate | iti matvā bhajante māṃ budhā bhāvasamanvitāḥ || 10-8 ||
— मैं समस्त का प्रभव ; — मुझसे सब प्रवृत्त होता है ; — ऐसा मानकर मुझे भजते हैं ; — बुद्धिमान्, भाव से युक्त

मैं समस्त का प्रभव (उद्गम) हूँ, मुझसे ही सब प्रवृत्त होता है; ऐसा मानकर भाव से युक्त बुद्धिमान् लोग मुझे भजते हैं।