Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 10.5 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)10.5

10.5
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः । भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥ १०-५ ॥
ahiṃsā samatā tuṣṭistapo dānaṃ yaśo'yaśaḥ | bhavanti bhāvā bhūtānāṃ matta eva pṛthagvidhāḥ || 10-5 ||
— अहिंसा, समता, सन्तोष ; — तप, दान, यश, अपयश ; — भूतों के भाव उत्पन्न होते हैं ; — मुझसे ही, नाना प्रकार के

अहिंसा, समता, सन्तोष, तप, दान, यश और अपयश — भूतों के ये नाना प्रकार के भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।