The Great Liberation Tantra2.23
जीवप्रवृत्तिकारीणि कानिचित् कथितान्यपि ।
देवा नानाविधाः प्रोक्ता देव्योऽपि बहुधाः प्रिये ॥२३॥
jīvapravṛttikārīṇi kānicit kathitānyapi |
devā nānāvidhāḥ proktā devyo'pi bahudhāḥ priye ||23||
— जीवों की प्रवृत्ति कराने वाले ; — कुछ (तन्त्र) ; — कहे गए ; — भी ; — देव ; — नाना प्रकार के ; — कहे गए ; — देवियाँ ; — भी ; — अनेक प्रकार की ; — हे प्रिये हे प्रिये, जीवों की प्रवृत्ति कराने वाले कुछ (तन्त्र) भी कहे गए हैं; नाना प्रकार के देव कहे गए हैं, और देवियाँ भी अनेक प्रकार की —