The Great Liberation Tantra· 2.22 / 54

The Great Liberation Tantra2.22

2.22
अधिकारिविभेदेन पशुबाहुल्यतः प्रिये । कुलाचारोदितं धर्मं गुप्त्यर्थं कथितं क्वचित् ॥२२॥
adhikārivibhedena paśubāhulyataḥ priye | kulācāroditaṃ dharmaṃ guptyarthaṃ kathitaṃ kvacit ||22||
— अधिकारी के भेद से ; — पशुओं की बहुलता के कारण ; — हे प्रिये ; — कुलाचार में कहा गया ; — धर्म को ; — गुप्ति के लिए ; — कहा गया ; — कहीं-कहीं

हे प्रिये, अधिकारी के भेद से और पशुओं की बहुलता के कारण, कुलाचार में कहा गया धर्म गुप्ति के लिए कहीं-कहीं ही कहा गया है।