नान्यः पन्था मुक्तिहेतुरिहामुत्र सुखाप्तये ।
यथा तन्त्रोदितो मार्गो मोक्षाय च सुखाय च ॥२०॥
nānyaḥ panthā muktiheturihāmutra sukhāptaye |
yathā tantrodito mārgo mokṣāya ca sukhāya ca ||20||
— और कोई नहीं; — मार्ग; — मुक्ति का हेतु; — इस लोक में; — परलोक में; — सुख की प्राप्ति के लिए; — जैसा; — तन्त्र में कहा गया; — मार्ग; — मोक्ष के लिए; — और; — सुख के लिए; — और
जैसे तन्त्र में कहा गया मार्ग मोक्ष और सुख दोनों के लिए है, वैसा इहलोक में मुक्ति का हेतु और परलोक में सुख की प्राप्ति का अन्य कोई मार्ग नहीं है।