The Great Liberation Tantra· 2.19 / 54

The Great Liberation Tantra2.19

2.19
मद्वक्त्रादुदितं धर्मं हित्वाऽन्यद्धर्ममीहते । अमृतं स्वगृहे त्यक्त्वा क्षीरमार्कं स वाञ्छति ॥१९॥
madvaktrāduditaṃ dharmaṃ hitvā'nyaddharmamīhate | amṛtaṃ svagṛhe tyaktvā kṣīramārkaṃ sa vāñchati ||19||
— मेरे मुख से ; — निकले ; — धर्म को ; — छोड़कर ; — अन्य धर्म को ; — इच्छा करता है ; — अमृत को ; — अपने घर में ; — त्यागकर ; — दूध को ; — अर्क (आक) के रस को ; — वह ; — चाहता है

जो मेरे मुख से निकले धर्म को छोड़कर अन्य धर्म की इच्छा करता है, वह अपने घर में अमृत (दूध) को त्यागकर अर्क (आक) के (कड़वे) रस की कामना करता है।