The Great Liberation Tantra· 2.18 / 54

The Great Liberation Tantra2.18

2.18
कलावन्योदितैर्मार्गैः सिद्धिमिच्छति यो नरः । तृषितो जाह्नवीतीरे कूपं खनति दुर्मतिः ॥१८॥
kalāvanyoditairmārgaiḥ siddhimicchati yo naraḥ | tṛṣito jāhnavītīre kūpaṃ khanati durmatiḥ ||18||
— कलियुग में ; — अन्यत्र कहे गए (मार्गों) से ; — मार्गों से ; — सिद्धि को ; — इच्छा करता है ; — जो ; — मनुष्य ; — प्यासा ; — गङ्गा के तट पर ; — कुआँ ; — खोदता है ; — दुर्बुद्धि

जो मनुष्य कलियुग में अन्यत्र कहे गए मार्गों से सिद्धि चाहता है, वह दुर्बुद्धि गङ्गा के तट पर प्यासा होकर कुआँ खोदता है।