The Great Liberation Tantra· 1.47 / 72

The Great Liberation Tantra1.47

1.47
दास्यन्ति धनलोभेन स्वदारान्नीचजातिषु । ब्राह्मण्यचिह्नमेतावत् केवलं सूत्रधारणम् ॥४७॥
dāsyanti dhanalobhena svadārānnīcajātiṣu | brāhmaṇyacihnametāvat kevalaṃ sūtradhāraṇam ||47||
— देंगे ; — धन के लोभ से ; — अपनी स्त्रियों को ; — नीच जातियों में ; — ब्राह्मणत्व का चिह्न ; — केवल इतना ; — मात्र ; — यज्ञोपवीत का धारण

धन के लोभ से वे अपनी स्त्रियों को नीच जातियों में दे देंगे; ब्राह्मणत्व का चिह्न केवल इतना ही — मात्र यज्ञोपवीत का धारण — रह जाएगा।