दास्यन्ति धनलोभेन स्वदारान्नीचजातिषु ।
ब्राह्मण्यचिह्नमेतावत् केवलं सूत्रधारणम् ॥४७॥
dāsyanti dhanalobhena svadārānnīcajātiṣu |
brāhmaṇyacihnametāvat kevalaṃ sūtradhāraṇam ||47||
धन के लोभ से वे अपनी स्त्रियों को नीच जातियों में दे देंगे; ब्राह्मणत्व का चिह्न केवल इतना ही — मात्र यज्ञोपवीत का धारण — रह जाएगा।