— इन्द्रजाल-मय विश्व (कर्म कारक — समासगत); — व्यस्त (बिखरा हुआ) (विशेषण); — अथवा (अव्यय); — चित्र-कर्म (चित्रकला) के समान (समासगत विशेषण); — भ्रमत्, घूमता हुआ (वर्तमान कृदन्त); — अथवा (अव्यय); — ध्यान करने वाले के लिए (षष्ठी एकवचन); — और सब देखते हुए के लिए (कर्म + वर्तमान कृदन्त + अव्यय); — सुख का उदय (कर्ता कारक — समासगत)
विश्व को इन्द्रजाल-मय, व्यस्त (बिखरा हुआ), चित्र-कर्म (चित्र-कला) के समान, अथवा भ्रमते हुए के रूप में ध्यान करते हुए और देखते हुए (साधक को) सुख का उदय होता है। (धारणा ६७)