Vijñāna Bhairava Tantra · 1.84

Vijñāna Bhairava Tantra 1.84

1.84
कामक्रोधलोभमोहमदमात्सर्यगोचरे । बुद्धिं निस्तिमितां कृत्वा तत्तत्त्वमवशिष्यते ॥८४॥
kāmakrodhalobhamohamadamātsaryagocare | buddhiṃ nistimitāṃ kṛtvā tat tattvam avaśiṣyate
anuṣṭubh
— काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य के गोचर में (अधिकरण — समासगत) ; — बुद्धि को निस्तिमित (निश्चल) करके (कर्म + विशेषण + क्त्वान्त) ; — वह तत्त्व ही शेष रहता है (कर्ता + कर्मवाच्य वर्तमान)

काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य के गोचर में बुद्धि को निस्तिमित (निश्चल, स्थिर) करके (उनके पीछे का) वह तत्त्व ही अवशेष रह जाता है। (धारणा ६६)