— चित्-धर्म (चैतन्य-स्वरूप) वाले (समासगत विशेषण); — सब देहों में (अधिकरण बहुवचन — समासगत); — कहीं विशेष (भेद) नहीं है — कर्ता + निषेध + अव्यय; — और इससे (अव्यय-युग्म); — तन्मय सब, सब उसी (चित्) -मय (कर्म कारक); — भावना करता हुआ (वर्तमान कृदन्त); — भव-जित् (संसार-विजयी) पुरुष (कर्ता कारक — समासगत)
सब देहों में चित्-धर्म (चैतन्य-स्वरूप) है, कहीं कोई विशेष (भेद) नहीं है — इस प्रकार सर्व को तन्मय (चित्-स्वरूप) भावना करते हुए (साधक) भव-जित् (संसार-विजयी) हो जाता है। (धारणा ६५)