न चित्तं निक्षिपेद्दुःखे न सुखे वा परिक्षिपेत् ।
भैरवि ज्ञायतां मध्ये किं तत्त्वमवशिष्यते ॥८६॥
na cittaṃ nikṣiped duḥkhe na sukhe vā parikṣipet |
bhairavi jñāyatāṃ madhye kiṃ tattvam avaśiṣyate
anuṣṭubh
— चित्त को दुःख में न डाले (कर्म + निषेध + विधि लिङ् + अधिकरण); — न ही सुख में परिक्षेप करे (निषेध + अधिकरण + विधि लिङ्); — हे भैरवि! (सम्बोधन); — मध्य में जाना जाए (कर्मवाच्य आज्ञार्थ + अधिकरण); — क्या तत्त्व शेष रहता है? — प्रश्न + कर्ता + क्रिया
हे भैरवि! चित्त को न दुःख में निक्षेपित करे, न सुख में परिक्षेपित करे; मध्य में जो (शेष) तत्त्व रह जाता है — उसे जानना चाहिए। (धारणा ६८)