Vijñāna Bhairava Tantra · 1.87

Vijñāna Bhairava Tantra 1.87

1.87
विहाय निजदेहास्थां सर्वत्रास्मीति भावयन् । दृढेन मनसा दृष्ट्या नान्येक्षिण्या सुखी भवेत् ॥८७॥
vihāya nijadehāsthāṃ sarvatrāsmīti bhāvayan | dṛḍhena manasā dṛṣṭyā nānyekṣiṇyā sukhī bhavet
anuṣṭubh
— छोड़कर (क्त्वान्त) ; — अपने देह की आस्था को (कर्म — समासगत) ; — मैं सर्वत्र हूँ — इस प्रकार (वर्तमान उत्तम + अव्यय) ; — भावना करता हुआ (वर्तमान कृदन्त) ; — दृढ़ मन से (करण कारक) ; — दृष्टि से (करण कारक) ; — अन्य कुछ न देखने वाली (समासगत विशेषण) ; — सुखी हो जाता है (कर्ता + विधि लिङ्)

अपने देह की आस्था (आसक्ति) को छोड़कर 'मैं सर्वत्र हूँ' इस प्रकार दृढ़ मन से भावना करता हुआ, अन्य कुछ न देखने वाली दृष्टि से (साधक) सुखी हो जाता है। (धारणा ६९)