Vijñāna Bhairava Tantra · 1.48

Vijñāna Bhairava Tantra 1.48

1.48
यत्र यत्राक्षमार्गेण चैतन्यं व्यज्यते विभोः । तस्य तन्मात्रधर्मित्वाच्चिल्लयाद्भरितात्मता ॥४८॥
yatra yatrākṣamārgeṇa caitanyaṃ vyajyate vibhoḥ | tasya tanmātradharmitvāc cillayād bharitātmatā
anuṣṭubh
— जहाँ-जहाँ (अव्यय-युग्म) ; — इन्द्रिय-मार्ग से (करण — समासगत) ; — चैतन्य, चित्-शक्ति (कर्ता कारक) ; — अभिव्यक्त होती है (कर्मवाच्य वर्तमान) ; — विभु (व्यापक प्रभु) की — षष्ठी एकवचन ; — उस (साधक) की (षष्ठी एकवचन) ; — केवल उसी (चैतन्य) के धर्म-धारित्व के कारण (अपादान — समासगत) ; — चित्-लय से (अपादान — समासगत) ; — भरितात्मता, पूर्ण-आत्म-स्वरूपता (कर्ता कारक — समासगत)

जहाँ-जहाँ इन्द्रिय-मार्ग से विभु (व्यापक) की चैतन्य-शक्ति अभिव्यक्त होती है, वहाँ — उसके (साधक के) तन्मात्र-धर्मित्व (केवल चैतन्य-धर्म रहने) से, चित्-लय के कारण भरितात्मता (पूर्णता) प्राप्त होती है। (धारणा ३०)